‘‘ शासकीय महाविद्यालय गुण्डरदेही द्वारा आयोजित किया गया एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबीनार ’’
शासकीय महाविद्यालय गुण्डरदेही द्वारा भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी भाषा और साहित्य विषय पर आयोजित एक दिवसीय वेबीनार से जुड़ने के लिए 15 राज्यों से 1100 से अधिक प्रतिभागियों ने पंजीयन कराया और गुगल मीट तथा यूट्यूब लाइव के माध्यम से जुड़कर हिन्दी साहित्य के वरिष्ठ साहित्यकारों प्रो. अरूण होता और डाॅ. शीतांशु कुमार के व्याख्यान को सुना एवं देखा। व्याख्यान का आरंभ हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डाॅ. अभिषेक कुमार पटेल के स्वागत उद्बोधन के साथ हुआ। डाॅ. अभिषेक पटेल ने बताया कि भूमंडलीकरण ने अमीर और गरीब के बीच की खाई को और चैंड़ा किया है। किसानों, मजदूरों, आदिवासियों का शोषण एवं विस्थापन बढ़ा है। संस्कृति का अवमूल्यन एवं अबाध उपभोक्तावाद भी बढ़ा है। हिन्दी साहित्य में इसकी पीड़ा देखी जा सकती है। लोक प्रिय कथाकार रणेन्द्र का उपन्यास ‘ग्लोबल गांव का देवता’ में भूमंडलीकरण एवं निजीकरण के कारण तबाह होती आदिवासी संस्कृति एवं उनके शोषण को चित्रित करता है।
उद्घाटन संबोधन देते हुए महाविद्यालय की प्राचार्य डाॅ.(श्रीमती) श्रद्धा चन्द्राकर ने भूमंडलीकरण को हिन्दी भाषा एवं साहित्य के लिए अवसर के रूप में देखा। आज विश्व के कई देशों में हिन्दी बोली समझी जा रही है। बाजार में हिन्दी फिल्मों, भारतीय संस्कृति के साथ - साथ हिन्दी भाषा और साहित्य को ग्लोबल बनाया है। डाॅ. श्रद्धा चन्द्राकर भूमंडलीकरण और हिन्दी भाषा एवं साहित्य के विस्तार के लिए अनुवाद की भूमिका को महत्वपूर्ण मानती है।
इस राष्ट्रीय वेबीनार में मुख्य वक्ता हिन्दी साहित्य के वरिष्ठ साहित्यकार एवं पश्चिम बंगाल राज्य विश्वविद्यालय बारासात, कोलकाता के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. अरूण होता ने भूमंडलीकरण का समाज पर पड़े प्रभाव और हिन्दी साहित्य में उसकी अभिव्यक्ति को बड़े ही सहज एवं प्रभावशाली ढंग से श्रोताओं के सामने रखा। इन्होंने कहा कि हमें भूमंडलीकरण के षड़यंत्र को समझना होगा। आज हम बाजार द्वारा चारों तरफ से घिर चुके हैं। प्रो.होता ने छत्तीसगढ़ के कथाकार कैलाश वनवासी की कहानी ” रामधन बाजार में ” के माध्यम से बाजार के शोषणतंत्र को उजागर किया।
इस वेबीनार के दूसरे वक्ता हिन्दी साहित्य के युवा आलोचक असम विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. शीतांशु कुमार ने भूमंडलीकरण के कारण लुप्त होती भाषाओं, हिन्दी बोलियों पर पड़ने वाले प्रभाव को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया। इन्होंने बताया कि बाजार ने अपने उत्पाद बेचने के लिए हिन्दी भाषा का उपयोग किया परंतु बोलियों की ओर ध्यान नहीं दिया। डाॅ.शीतांशु कुमार ने बताया कि ” भूमंडलीकरण पूँजी केन्द्रित अर्थव्यवस्था की पोषक अवधारणा है जिसका मुनाफा कुछ लोगों तक पहुँच रहा है और ज्यादा से ज्यादा लोग गरीब होते जा रहे हैं।
इस वेबीनार के तीसरे वक्ता शास.महाविद्यालय भखारा के सहायक प्राध्यापक डाॅ. भुवाल सिंह ठाकुर ने भूमंडलीकरण एवं जल, जंगल, जमीन के प्रश्न को कविता के माध्यम से सबके सामने रखा।
शास. महा. मचांदुर के सहायक प्राध्यापक डाॅ.अम्बरीश त्रिपाठी ने ‘‘ आपदा को अवसर में तब्दील करने वाली सोच को बाजार का सोच बताया। यह सोच मानवता के बदले मुनाफा को सबसे ऊपर रखती है।
कार्यक्रम के अंत में महाविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक डाॅ.के.डी.चावले ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर राष्ट्रीय वेबीनार के आयोजन सचिव डाॅ.डी.आर.मेश्राम सहित वरिष्ठ प्राध्यापक श्री डी.एस.सहारे एवं डाॅ.(श्रीमती) निगार अहमद भी सक्रिय रूप से गुगल मीट से जुड़े रहे। इस वेबीनार में छत्तीसगढ़ सहित देशभर सैंकड़ो, प्राचार्य, विद्वान प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष, शोधार्थी, साहित्य प्रेमी एवं छात्र - छात्राएं जुड़े रहे। इस वेबीनार को युट्यूब पर कभी भी देखा जा सकता है।